हित हरिवंश महाप्रभु जी की बाल लीलाएँ

श्री हित महाप्रभु जी के जीवन में भक्ति का प्रकाश जन्म के साथ ही प्रकट हो गया था। कहा जाता है कि उनके मुख से निकला पहला शब्द ही था
“श्री राधा”।
यह कोई साधारण शब्द नहीं था, यह उनके हृदय की दिशा थी।

महाप्रभु जी अपने घर देवबंद लौट आए। उनके घर में पहले से ही श्री राधा मोहन जी की सेवा अखंड रूप से चली आ रही थी। उनके पिता, श्री वेदव्यास जी, उन्हें बालक समझकर सेवा करने से रोकते थे। पर भक्ति को कौन रोक सकता है।
बाल हरिवंश बाहर खड़े होकर, निश्चल नेत्रों से, गहन भाव में श्री राधा मोहन जी के दर्शन करते रहते थे।

उनके होंठों पर हर समय एक ही नाम रहता था
श्री राधा, श्री राधा।

उनके सखा उन्हें खेलने बुलाने आते, पर उनका मन खेलों में नहीं लगता था। सखा कहते, “आप जो खेलेंगे, वही हम खेलेंगे।”
तब श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी अपने सखाओं को ही श्री राधा और श्री कृष्ण का स्वरूप बना देते।
श्याम वर्ण वाले सखा को वे श्री राधारानी का भाव देते और गौर वर्ण वाले को ठाकुर जी का।
बाल लीलाओं में ही राधा मोहन प्रकट हो जाते।

इसी भक्ति और भाव में वे बड़े हुए।

एक दिन श्री वेदव्यास जी ने कहा, “आज भीतर जाकर प्रभु को पंखा करो।”
जैसे ही महाप्रभु जी पंखा करने लगे, वे मानसी भाव में निकुंज पहुँच गए।
वहाँ श्री राधा मोहन जी साक्षात थे।
महाप्रभु जी विनीत भाव से बोले,
“कृपा कर कोई राग सुनाइए, कोई पद सुनाइए।”

इतने में वे बाह्य चेतना से विलीन हो गए।
श्री राधा मोहन जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले,
“अब जाओ। तुम्हारे घर के पीछे जो कुआँ है, वहाँ श्री नवरंगी लाल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

यह सुनते ही महाप्रभु जी ने कोई विलंब नहीं किया।
वे दौड़े और कुएँ में कूद पड़े।

आस पास के गाँवों में हलचल मच गई।
लोग कहने लगे, “यह क्या हो गया। हरिवंश कुएँ में गिर गए।”

पर यह गिरना नहीं था, यह प्रकट होना था।
कुएँ से श्री हित महाप्रभु जी बाहर आए और उनके साथ थे श्री नवरंगी लाल प्रभु जी।

यह लीला आज भी प्रेमियों के हृदय में भक्ति का दीप जलाती है।

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